भक्त का कल्याण अनन्य भक्ति सत्संग नाम स्मरण और पूर्ण शरणागति और समर्पण द्वारा होता है- स्वामी रमायणाचार्य वेदांती जी महाराज
ANJANI KUMAR
अरवल
अरवल जिले के कलेर प्रखंड के ग्राम कोयल भूपत में आयोजित श्रीमद् भागवत सप्ताह कथा ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिन स्वामी श्री रामायणाचार्य वेदांती जी महाराज ने कथा पीठ से कहा कि उद्धव जी और श्री कृष्ण के बीच का संवाद ज्ञान भक्ति और कर्म का अद्भुत संगम है महाभारत के अंत में जब श्री कृष्ण ने उद्धव को कुछ मांगने को कहा तो उन्होंने वरदान के बजाय कृष्ण के व्यक्तिगत जीवन के विरोधाभासो और लीलाओं के पीछे के रहस्य को समझने की इच्छा प्रकट की उद्धव ने पूछा कि सच्चा मित्र कौन है भगवान ने उत्तर दिया वह जो मांगे बिना ही आवश्यकता के समय मित्र की सहायता के लिए उपस्थित हो जाए उन्होंने सवाल किया कि कृष्ण सर्वज्ञ होते हुए भी द्रोपदी के चीर हरण के समय मुक दर्शक क्यों बने? कृष्ण ने समझाया कि वह केवल कर्म के साथी थे और दुशासन तभी तक शक्तिशाली था जब तक द्रौपदी अपनी शक्ति पर निर्भर थी जब उसने पूर्ण शरणागति के साथ ईश्वर को पुकारा तो सहायता तुरंत पहुंची ,भक्त का कल्याण अनन्य भक्ति सत्संग नाम स्मरण और पूर्ण शरणागति द्वारा होता है। भगवान ने स्पष्ट किया कि केवल ज्ञान या शुष्क जोश से ही नहीं बल्कि प्रेममय भक्ति से ही जीव का उद्धार संभव है। भगवान में अटूट प्रेम रखना और बिना किसी स्वार्थ के उनकी सेवा करना है सच्ची भक्ति है। संतों के सानिध्य मात्र से सारे दुख मिट जाते हैं और भगवान के प्रति रुचि जागृत होती है। भगवान का निरंतर नाम जपना अपने ज्ञान बल या पद का अभिमान छोड़कर भगवान के चरणों में खुद को पूरी तरह समर्पित कर देना ही सच्ची भक्ति है ।उन्होंने कल्कि अवतार के बारे में बताते हुए कहा कि कलयुग में जब लोग धर्म के रास्ते से भटक जाएंगे और पृथ्वी पर अन्याय अत्याचार तथा पाप बढ़ जाएगा तब भगवान कल्कि ही दुष्टों का संहार करेंगे उनके द्वारा धर्म की पुनर्स्थापना करने के बाद ही धरती पर पुनः सतयुग की शुरुआत होगी भगवान कल्कि का जन्म उत्तर प्रदेश के संभल नामक गांव में होगा उनके पिता का नाम विष्णुयश होगा और उनकी माता का नाम सुमति होगी ।कलयुग की अवधि समाप्त होने और सतयुग के बीच के संक्रमण काल में अवतार होगा उनके पास देवदत्त नाम का एक बहुत शक्तिशाली और तेज सफेद घोड़ा होगा और धरती पर धर्म की स्थापना, दुष्टो का नाश सतयुग की शुरुआत एवं भक्तों की रक्षा होगी।
कथा के अंतिम दिन वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हवन और पूर्णाहुति के बाद महाप्रसाद का वितरण किया गया जिसमें सैकड़ो की संख्या में श्रद्धालुओं ने महाप्रसाद ग्रहण किया
भंडारे का भी हुआ आयोजन
कथा के अंतिम दिन भंडारे का आयोजन किया गया जिसमें स्थानीय निवासियों साधु संतों और दर्जनों ग्रामों से आये भक्तों के लिए भोजन की विशेष व्यवस्था की गई थी आयोजन समिति के शिव विनोद शर्मा एवं अविनाश कुमार ने बताया कि यह आयोजन सनातन संस्कृति के प्रति लोगों की आस्था को दर्शाता है ऐसे धार्मिक कार्यक्रमों का उद्देश्य समाज में एकता और सद्भावना को बढ़ावा देना है जिससे आपसी भाईचारा एकता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार होता है।


